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पत्रकार विनोद दुआ के ख़िलाफ़ राजद्रोह के मामले को सुप्रीम कोर्ट ने किया ख़ारिज

Written by कार्यालय,बैस्ट रिपोर्टर न्यूज,जयपुर। समाचार डेस्क प्रभारी—1 on . Posted in ताजा खबर

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार विनोद दुआ के एक यूट्यूब कार्यक्रम को लेकर उनके खिलाफ राजद्रोह के आरोप में हिमाचल प्रदेश के एक स्थानीय भाजपा नेता द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी गुरुवार को रद्द कर दी.

हालांकि जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस विनीत सरन की पीठ ने दुआ के उस अनुरोध को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि जब तक एक समिति अनुमति नहीं दे देती, तब तक पत्रकारिता का 10 साल से अधिक का अनुभव रखने वाले किसी मीडियाकर्मी के खिलाफ कोई प्राथमिकी दर्ज न की जाए.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने कहा, ‘प्रत्येक पत्रकार केदार नाथ सिंह मामले (जिसने आईपीसी की धारा 124ए के तहत राजद्रोह के अपराध के दायरे को परिभाषित किया था) के तहत सुरक्षा का हकदार है.’

केदार नाथ सिंह (1962) केस में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि ‘कथित राजद्रोही भाषण और अभिव्यक्ति के लिए व्यक्ति को तभी दंडित किया जा सकता है, जब वो भाषण ‘उकसाने वाला’ ‘हिंसा’ या ‘सार्वजनिक अव्यवस्था’ के लिए नुकसान पहुंचाने वाला हो.

शीर्ष अदालत ने पिछले साल 20 जुलाई को मामले में किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से दुआ को दी गई सुरक्षा को अगले आदेश तक बढ़ा दिया था.

शीर्ष अदालत ने पहले कहा था कि दुआ को मामले के संबंध में हिमाचल प्रदेश पुलिस द्वारा पूछे गए किसी अन्य पूरक प्रश्न का उत्तर देने की आवश्यकता नहीं है.

इस मामले को लेकर वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ ने अपने बचाव में सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि सरकार की आलोचना तब तक राजद्रोह नहीं है, जब तक वह हिंसा को भड़काने वाली नहीं हो. उन्होंने कहा कि अगर मैं प्रधानमंत्री की आलोचना करता हूं तो यह सरकार की आलोचना के दायरे में नहीं आता.

दुआ की ओर से उनके मामले की पैरवी कर रहे वकील विकास सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के 1962 के केदारनाथ मामले के फैसले का उल्लेख करते हुआ कहा था कि एक नागरिक होने के नाते यह विनोद दुआ का अधिकार है कि वह सरकार के बारे में जो भी कहना चाहते हैं, उसे कह या लिख सकते हैं. सरकार की आलोचना या उस पर टिप्पणी कर सकते हैं.

सिंह ने कहा कि हालांकि सरकार की आलोचना या उस पर टिप्पणी ऐसी होनी चाहिए कि उससे लोग सरकार के खिलाफ किसी तरह की हिंसा के लिए न उकसे. सिंह ने कहा, ‘अगर हमारे प्रेस को स्वतंत्र रूप से कामकाज करने की अनुमति नहीं दी गई तो सच्चे अर्थों में हमारा लोकतंत्र खतरे में है.’

उन्होंने कहा कि दुआ को भारतीय दंड संहिता की धारा 505 (2) और 153ए के तहत लगाए गए आरोपों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उन्होंने पत्रकार के रूप में किसी धर्म, नस्ल, भाषा, क्षेत्रीय समूह या समुदाय के खिलाफ कुछ नहीं किया है.

विनोद दुआ ने न्यायालय से मांग की थी कि उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को खारिज करने के साथ-साथ उन्हें प्रताड़ित करने के लिए नुकसान की भरपाई की जाए.

उन्होंने यह भी मांग किया था कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त किए गए जज, विपक्ष के नेता और गृह मंत्री की सदस्यता में एक समिति का गठन हो, जिसके निर्देश के बिना 10 से अधिक के अनुभव वाले पत्रकारों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज न हो.

हालांकि कोर्ट ने पत्रकार की इस मांग को खारिज कर दिया. विनोद दुआ ने कहा था कि ये एक बुरा चलन सा बन गया है कि जो सरकार किसी रिपोर्ट से नाखुश होती है या उनकी विचारधारा के अनुरूप नहीं होता है, तो पत्रकार को प्रताड़ित करने के लिए उनके खिलाफ केस दर्ज कर लिया जाता है ताकि वे सत्ता के सामने समर्पण कर दें.

उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्रवाई मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है.

मालूम हो कि भाजपा नेता अजय श्याम ने हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के कुमारसैन थाने में पिछले साल छह मई को राजद्रोह, सार्वजनिक उपद्रव मचाने, मानहानिकारक सामग्री छापने आदि के आरोप में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दुआ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी और पत्रकार को जांच में शामिल होने को कहा गया था.

श्याम ने आरोप लगाया था कि दुआ ने अपने यूट्यूब कार्यक्रम में प्रधानमंत्री पर कुछ आरोप लगाए थे कि उन्होंने वोट लेने के लिए ‘मौतों एवं आतंकी हमलों’ का इस्तेमाल किया है.

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि मीडिया के संदर्भ में राजद्रोह कानून पर विस्तृत विचार करने और इसकी सीमाएं तय करने की जरूरत है.

आंध्र प्रदेश के दो तेलुगू न्यूज चैनलों के खिलाफ दर्ज राजद्रोह के मामले में किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि वह अभिव्यक्ति की आजादी और मीडिया के अधिकारों के संदर्भ में राजद्रोह कानून की व्याख्या की समीक्षा करेगी.