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समझें समय के महत्त्व को

Written by स्वत्वाधिकारी,बैस्ट रिपोर्टर न्यूज,जयपुर on . Posted in विशेष संपादकीय आलेख

आपने अकसर लोगों को यह कहते सुना होगा कि ‘समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता’, ‘समय बहुत बलवान होता है’ आदि आदि। ये कथन न सिर्फ सत्य हैं वरन् समय की शक्ति को प्रबलता से प्रकट भी करते हैं। समय की शक्ति के सामने किसी की नहीं चलती है। सांसें थम जाती हैं,जीवन रूक जाता है परन्तु समय; समय कभी नहीं रूकता। वह निरन्तर अपने पथ पर बढ़ता रहता है। ज्ञानी लोग समय को तकदीर का बादशाह भी कहते हैं। जो समय का लाभ उठाते हैं वे धन-दौलत,सुख-वैभव से सराबोर हो जाते हैं,जो चूक जाते हैं वे खाक में मिल जाते हैं। समय ने असंख्य राज्यों को बनते-बिगड़ते देखा है। सहस्त्रों युद्ध होते देखे हैं, शहरों को आबाद और बर्बाद होते देखा है। पर समय की गति कभी धीमी नहीं पड़ी। संत कबीर ने इस दोहे से समय के महत्त्व को इंगित किया है:- ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में प्रलय होएगी, बहुरी करेगो कब।’ अर्थात् जो तुझे कल करना है उसे तू आज कर ले और जो आज करना है उसे अभी यानी फौरन कर ले। क्योंकि कभी भी कुछ भी हो सकता है,एक पल में भी प्रलय आ सकती है। बाद में क्या-क्या करेगा। कितना सत्य कहा गया है संत कबीर की इन पंक्तियों में। समय के साथ चलने की आदत

मनुष्य को डालनी चाहिए। हर गुजरते पल के साथ एक अवसर जुडा होता है अतः हर पल हमारे लिए अनमोल है। जरा सी देरी करने का परिणाम बहुत भयंकर हो सकता है। उदाहरण के लिए एक बार एक मरीज बेहद गम्भीर हालत में अस्पताल में भर्ती हुआ। डाक्टर ने मरीज के पुत्र को एक विशेष दवा लाकर अतिशीध्र देने को कहा। पुत्र ने समय का महत्व नहीं समझा और लापरवाही पूर्वक दवा लाने में देरी कर दी जिससे उसके पिता की मृत्यु हो गयी। कहने का अर्थ है कि समय की प्रति मामूली से मामूली लापरवाही भी हमें अपूर्णीय क्षति पहुंचा सकती है। अमेरिका को एक विशेष समाचार मिलने में चंद मिनटों की देरी हो जाने के कारण जापान जैसे छोटे देश ने अमेरिकी सैनिक अड्डे पर्लहार्बर का तहस-नहस कर दिया। एक राजा शतरंज खेल रहा था। उसके सेवक ने उसे एक पत्र लाकर दिया। राजा ने पत्र को बिना पढे ही अपनी जेब में रख लिया। खेल समाप्त होने पर जब उसने पत्र को पढ़ा तब तक वो दुश्मन के सैनिकों से घिर चुका था। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी-न-कभी ऐसी घड़ियाँ अवश्य आती हैं,जिन पर उसके भाग्य का बनना या बिगड़ना निर्भर होता है। यदि मन जरा भी हिचकिचाता है या डरता है तो सब कुछ चला जाता है,नष्ट हो जाता है।
मनुष्य को चहिए कि जब उसका एक काम समाप्त हो जाए,जो वह दूसरे काम में लग जाए। होता यह है कि व्यक्ति एक काम समाप्त करके विश्राम करने लगता है। यह विश्राम क्यों होता है? यह आलस्य-रूपी शराब का प्याला होता है। उस विश्राम द्वारा वह अपने पूर्वसंचित समय के मूल्य को खो देता है। उस विश्राम में उसे वर्तमान और भविष्य का धुघला प्रकाश भी पुनः दिखाई नहीं पड़ता। अतः मनुष्य को स्वाभाविक विश्राम द्वारा समय नष्ट करने की आवश्यकता नहीं। जवानी का सारा समय विशिष्ट प्रकार की रचना,विशिष्ट प्रकार के सुधार और शिक्षण का समय है। इस काल का एक घण्टा भी ऐसा नहीं जो मानव के भाग्य-निर्माण के लिए उपयोगी न हो। ऐसी एक भी घड़ी नहीं होती,जिसके लिए निर्धारित कार्य को फिर किया जा सके। लोहा ठण्डा हो जाने पर उसे कितना ही पीटो,उससे कुछ भी नया नहीं बनता। इसी प्रकार एक बार अवसर निकल जाने पर कुछ भी हाथ नहीं लगता। जर्मन तानाशाह नेपोलियन उचित और अनुकूल समय पर बहुत ही ज्यादा ध्यान देता था। वह अवसरों को हाथ से न जाने देता था। इसीलिए उसने बड़ी-बड़ी शुत्रु-सेनाओं पर विजय प्राप्त की। उसने कहा था कि सिर्फ पांच मिनट का मल्य न समझने के कारण ही आस्ट्रिया वाले पराजित हो गये थे। इसी तरह नेपोलियन के खुद के पतन और पराजय का कारण भी कुछ मिनटों की देरी ही बनी। उसका एक सेनापति समय पर नहीं आया,जिसके कारण नेपोलियन को रूकना पड़ा फलस्वरूप वह बंदी बना लिया गया और उसे सेण्ट हेलेना में जीवन के अंतिम क्षणों तक घुट-घुट कर अपने दिन काटने पड़े।
काम को टाला तो वह फिर कभी पूरा नहीं होता। जिस काम को हम अभी करेंगें,वही पूरा होगा। जो शक्ति हम आज के काम को कल पर टालने में व्यर्थ करते हैं,उसी शक्ति के द्वारा आज का कार्य आज ही किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जो कार्य अगले दिन पर टाल दिया जाता है,उसे अगले दिन करने में भी कठिनाइयाँ आती हैं। मन पर उस काम का बोझ बना रहता है और मन घबराता रहता है। परिणाम यह होता है कि वह कार्य हमें भार प्रतीत होने लगता हैै।जो बात आज की जा सकती है,उसमें हमें सुख और आनन्द अनुभव होगा,परन्तु कल वही बात दुःख पहुँचाने वाली और जीवन का काँटा अनुभव होने लगेगी। उदाहरण के लिए,पत्रों का उत्तर जितनी अच्छी तरह उसी समय दिया जा सकता है,उतना अच्छा और उतनी सूबी से बाद में नहीं दिया जा सकता। बड़ी-बड़ी दुकानों,व्यवसायां और कारखाने वाले पत्रों का उत्तर कल पर कभी नहीं छोडते।
शरीर में फुर्ती-चुस्ती हो तो आलस्य पास नहीं फटकता और काम भी भारी नहीं लगता। टाल देने का अभिप्राय कार्य को छोड़ देना होता है। बहुत प्रसिद्ध कहावत है ‘‘आषाढ़ का चूका किसान और डाल का चूका बन्दर कहीं का नहीं रहता’’ काम करना भी तो एक प्रकार का बीज बोना होता है। ययदि उसे ठीक समय पर नहीं बोया जायेगा तो वसंत ऋतु भी उसे फलने-फूलने की शक्ति देने में समर्थ नहीं हो सकती। वर्तमान के समान कोई अनमोल घड़ी,कोई शक्ति नहीं। यदि कोई अपने तुरन्त के निश्चयों को पूरा नहीं करता तो बाद में उनके पूरा होने की कोई आशा नहीं रहती। वे निश्चय ही छिन्न-भिन्न हो जाएंगें। महात्मा गाँधी जी सफलता के विभिन्न कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण उनकी समय की पाबंदी थी। लाल बहादुर शास्त्री से जब किसी ने उनकी सफलता का राज पूछा तो उन्होने भी इसका श्रेय अपनी समय पर कार्य करने की प्रवृत्ति को दिया। जो व्यक्ति तत्काल काम करता है और उससे काम में कुछ भूल भी हो जाती है तो भी वह अच्छा निर्ण करने वाले भविष्यवेत्ता या बाद में काम करने वाले की अपेक्षा लाभ में ही रहेगा और उसे अवश्य ही विजय प्राप्त होगी। जिन लोगों ने भी आज का काम कल पर छोडा, वे जीवन की दौड़ में पीछे रह गये। केवल पांच मिनट पीछे रहने के कारण ही वे प्रतियोगिता में पराजित हो गए। उनके परिजनों,मित्रों तथा उनके साथियांे ने उन स्थानों पर अधिकार जमा लिया,जिन्हें वे पांच मिनट पहले करने से जीत सकते थे। फिर जीवन की दौड़ तो अहुत ही कठिन प्रतियोगिता है।
एक विद्यार्थी निश्चय करता है कि मैं आज से कम-सेकम रात के दस बजे तक पढ़ा करूंगा। देखने में यह बहुत साधारण-सी बात है। सायंकाल आता है,चारों ओर अन्धकार-सा फैल जाता है। दीपक घर को प्रकाशित करने लगताहै,उसकी ज्योति फैलती है। विद्यार्थी भोजन करता है। धीरे-ाीरे आलस्य उस पर आक्रमण करता है,उसके निश्चय की दीवार हिलने-डगमगाने लगती है। विज्ञान में पक्ष में नए-नए तर्क उसके सम्मूख आने लगते हैं। वह सेाचने लगता है,‘‘अभी तो परीक्षा में बहुत दिन बाकी हैं। अभी ऐसी कौन-सी जल्दी है?कल से मैं नियमपूर्वक पढ़ना आरम्भ करूंगा।’’ बस, इसी तर्क-वितर्क में वह काम छोड़ देता है। यह घड़ी उसके विजय की घड़ी थी। इसी को अवसर कहते हैं। जीवन पर सफलता या असफलता की छाप लगाने के लिए इतना ही समय लगता है। वह विद्यार्थी फिर कभी इस बीते अवसर को पकड़ नहीं पाएगा। एक विद्यार्थी ही क्यों, यह तो ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के लिए है जो कुछ-न-कुछ करना चाहता है। उसके निश्चय के विरूद्ध आलस्य अपनी सारी शक्ति और सेना लेकर खड़ा हो जाता है। आलस्य के इस भयंकर दलदल को जीतकर जो व्यक्ति जीवन के मैदान में अपने झण्उे गाड़ देता है,वह निर्धन गली का भिखारी होने पर भी सम्राटोंसे श्रेष्ठ होता है। ‘कल’ तो शैतान का दूत है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां कल की इस तेज धार पर कितने ही प्रतिभाशालियों के गले कटने की घटनाएं अंकित हैं। कितनों की योजनाएं अधूरी रह गईं। कितनों के निश्चय उनके मन में ही रह गए और न जाने कितने व्यक्ति पठताते,हाथ मलते रह गए।
‘कल’ असमर्थता और आलस्य का प्रतीक है। आलस्य का मनुष्य के शरीर पर कब आक्रमण होता है,इसका ज्ञान होना या पता लगना कठिन है,क्योंकि आदत पड़ जाने और उससे प्रेम हो जाने के कारण उसके आने का समय होते ही ऐसा वातावरण तैयार होता है कि मनुष्य को ज्ञान-शुन्यता अनुभव होने लगती है। कुछ व्यक्ति दोपहर के भोजन के बाद उसका शिकार होते हैं,कुछ के सिर पर वह किसी भी समय भोजन के बाद सवार होने लगता है।