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संतोषी सदा सुखी

Written by स्वत्वाधिकारी,बैस्ट रिपोर्टर न्यूज,जयपुर on . Posted in विशेष संपादकीय आलेख

सदियों पुरानी कहावत है ‘‘संतोषी सदा सुखी’’। अर्थात् जीवन में संतोष रखने से ही सुख का अहसास होता है। इस अहसास की अनुभूति के लिए न सिर्फ अपनी इच्छाओं को  बेहद जरू़री जरू़रतों की पूर्ति तक सीमित रखने की आवश्यकता है वरन् जरू़रतों की पूर्ति के बाद बचे शेष धन को परोपकारी कार्यो में निःस्वार्थ रूप से लगाना भी जरू़री है। जैसे स्वाद के लालच में आवश्यकता से अधिक भोजन करते रहने से मोटापे के कारण जीवन बोझिल बन जाता है। उसी प्रकार आवश्यकता से अधिक धन का संचय करने की प्रवृत्ति भी परिवार में गलत संस्कारों एवं विपत्तियों को आमंत्रित करती है। अति सम्पन्नता के दुष्परिणामों से बचने का अगर कोई समाधान है तो वो है खुले मन से दान।  

धीरज,संतोष व सहन-शक्ति होने पर भौतिक वस्तुओं की कमी में भी आँखों में नमी नहीं आयेगी अन्यथा सम्पन्नता में भी विपन्नता और दुःख ही नज़र आयेगा। इस संबंध में दो प्राचीन उक्तियाँ बेहद महत्वपूर्ण हैं -

1Û  ‘‘संतोषं परमं सुखम्’’। 

अर्थात् परम सुख संतुष्टता में ही है।

2Û  ‘‘गौधन,गजधन,वाजिधन और रतन धन खान। 

जब आवे संतोष धन-सब धन धूरि समान।।

अर्थात् हाथी-घोड़ा-गाय और रत्नों धन की खान हैं परन्तु जब संतोष धन आ जाता है तो ये सब भी धूल के समान हो जाते हैं। 

सर्व शास्त्र शिरोमणि गीता में कहा गया है ‘ संतोषं हृदिस्थाय सुखार्थी संयतो भवेत,संतोष मूलं ही सुखं,दुःख मूलं विपर्ययः।’ अर्थात् जो सुखी जीवन चाहते हैं,वे संतोषी बने और जो संतोष चाहते हैं वे संयम-नियम के अभ्यासी होते जायें। सुख बाह्य पदार्थों में नहीं अन्तर्रात्मा में उपजता है। 

संग्रह की ही धुन में लगे रहेंगे तो जटिलतायें दिन दूनी,रात चैगुनी बढ़ती ही रहेंगी। संचय की प्रवृत्ति का कोई अन्त नहीं है। जिस प्रकार आग में घी डालने से अग्नि तीव्र हो जाती है उसी प्रकार संग्रह करने से असंतोष की अग्नि कम होने की बजाय बढती ही जाती है। लालच बढने पर हम अपने दायरे से निकलकर दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण करने लग जाते हैं। आज दूसरे को नीचा दिखाने और ऊँच-नीच की बेसमझी,दारूण दुःखों का रूप लेती जा रही है। मृगमरीचिका के समान बाहरी सुखों का कितना कितना ही पीछा करो,मात्र भाग-दौड़ ही हाथ लगेगी। रास्ते में कौन शिकारी मार गिरायेगा यह भय-शोक भी पीछा करता रहेगा। उन्मत्त लूट-खसोट,भागमभाग से सारा संसार ही अविश्वसनीय लगने लगता है। परमात्मा की संतान,हम आत्माओं का अक्षय आनन्द बहुत पीछे छूटता जा रहा है। परम् ज्योति पर एकाग्र होने से ही हम परमानन्द के परम स्रोत से प्रकाशमान हो पायेंगे।

अति लालच के कारण हमारे मौलिक गुण विलुप्त होते जा रहे हैं। प्रभु के प्रति जीवन समर्पण एवं सा-रे-ग-म-प-ध-नी नामक सातों सुरों से प्रदर्शित सात मौलिक गुणों-साहसिकता व संतुष्टता, रमणीकता,गम्भीरता,मधुरता, पवित्रता,धैर्यता,एवं निर्माणता के अनुकरण से हमारा जीवन संगीतमय बन सकता है।  सद्गुणों को धारण करने से जब सबका जीवन सुखदायी बन जाता है तो यही धरा स्वर्ग कहलाती है। परन्तु ये गुण आत्मिक वृत्ति से ही जाग्रत होते हैं। जैसे आत्मा अजर-अमर-अविनाशी है वैसे ही ये सभी गुण भी उसमें अविनाशी रूप से विराजमान रहते हैं। परन्तु असंतुष्ट बनकर अधिक पाने की ललक में हमारे ये सभी दिव्यगुण सुप्त हो गये हैं। यदि हम ईश्वरीय ज्ञान-योग से मन पर छाये विकारों के मलिन पर्दों को हटा दें तो पुनः मूल्यनिष्ठ बन सकते हैं। ऊपर वाला दातार सभी को देता है तो आप को क्यों वंचित रखेगा? हर हालात में संतुष्टता बनाये रखिये तो आप स्वतः,स्वयं को खुशनुमा अनुभव करते रहेंगे। 

मात्र लौकिक सुखों के पीछे भागते रहेंगें तो भव-बंधनों में उलझते ही रहेंगें। भौतिक सुख तो क्षण भर में दुखदायी भी हो सकते हैं। दुर्योधन,रावण,कैकयी के पास किस बात की कमी थी? दूसरों को दुःखी करने के चक्कर में तीनों असंतुष्ट थे। सांसारिक सुखों का उपभोग कीजिए पर न्याय,विनम्रता, पवित्रता, मेहनत और संतोष के साथ। सुख संतुष्टी तब आप को स्वतः प्राप्त होते लगेगी। और हाँ,अधिक प्राप्त होने पर दाता बनने से नहीं चूकिए।  इस संबंध में यह उक्ति बेहद प्रेरक है-‘‘पानी बाढे़ नाव में,घर में बाढे़ दाम,दोउ हाथ उलीचिए,यही सयानों काम।’’ अर्थात् नाव में पानी एवं घर में धन बढ़ने पर हानि का खतरा होता है अतः उसे दोनों हाथों से बाहर निकालना ही समझदारी भरा काम है।  आज जर-जोरू-जमीन और कुर्सी के लिए झगड़ते रहते व्यक्ति को ही बुद्धिमान माना जाता है। लोगों में भारी असंतोष है जो उन्हें अनैतिक कार्यों की ओर धकेल रहा है मिलावट,रिश्वतखोरी,भ्रष्टाचार एवं आतंक इसी असंतोष के परिणाम कहे जा सकते हैं। काली करतूतों वाले कूटनीतिज्ञ बंदूक व बम धमाकों से ही शांति व संतुष्टता महसूस करना चाहते हैं। नेता, डाक्टर,वकील,इंजीनियर,अधिकारी जैसे समझदार कहलाने वाले भी अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए अमन-चैन प्राप्त करना चाहते हैं।

सुख-शान्ति और संतुष्टता की दौड़ में जैसे कि पूरे कुएं में ही भाँग पड़ गयी है। सुख कहाँ है? संतुष्टि कैसे मिलेगी? कोई नहीं जानता है? क्यों कि मनुष्य ने भौतिक सुविधाओं को जीवन का लक्ष्य समझ लिया है और उन्हें जुटाने में इस कदर पागल हो गया है कि स्वयं की अंतर्रात्मा में झांकना ही भूल गया है जबकि सुख और संतोष तो हमारी स्वयं की अन्तर्रात्मा में मौजूद है।








 

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