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महिलाओं से जुड़े अपराध की सामान्य पड़ताल

Written by कार्यालय,बैस्ट रिपोर्टर न्यूज,जयपुर। समाचार डेस्क प्रभारी—1 on . Posted in विशेष संपादकीय आलेख

देशभर से मासूम बच्चियों और महिलाओं के साथ बलात्कार, हत्या, एसिड फेंकने जैसी घटनाएं लगभग रोज पढ़ने को मिल जाती हैं। बलात्कार के पहलुओं पर गौर करें तो कुछ प्रमुख कारण सामने आते हैं-

1. फैलता नशा :

नशा आदमी की सोच को विकृत कर देता है। उसका स्वयं पर नियंत्रण नहीं रहता और उसके गलत दिशा में बहकने की संभावनाएं शत-प्रतिशत बढ़ जाती है। ऐसे में कोई भी स्त्री उसे मात्र शिकार ही नजर आती है। और इसी नशे की वजह से दामिनी और गुडिया शिकार हुई थीं। अभी तक की सारी रिपोर्ट देखी जाएं तो 85 प्रतिशत मामलों में नशा ही प्रमुख कारण रहा है। हमारे देश में नशा ऐसे बिक रहा है जैसे मंदिरों में प्रसाद। आपको हर एक किलोमीटर में मंदिर मिले ना मिले पर शराब की दुकान जरूर मिल जाएगी। और शाम को तो लोग शराब की दुकान की ऐसी परिक्रमा लगाते हैं कि अगर वो ना मिली तो प्राण ही सूख जाएंगे।

2. पुरुषों की मानसिक दुर्बलता :

स्त्री देह को लेकर बने सस्ते चुटकुलों से लेकर चौराहों पर होने वाली छिछोरी गपशप तक और इंटरनेट पर परोसे जाने वाले घटिया फोटो से लेकर हल्के बेहूदा कमेंट तक में अधिकतर पुरुषों की गिरी हुई सोच से हमारा सामना होता है। पोर्न फिल्में और फिर उत्तेजक किताबें पुरुषों की मानसिकता को दुर्बल कर देती हैं और वो उस उत्तेजना में अपनी मर्यादाएं भूल बैठता है। और यही तनाव ही बलात्कार का कारण होता है।  ईश्वर ने नर और नारी की शारीरिक संरचना भिन्न इसलिए बनाई कि यह संसार आगे बढ़ सके। परिवेश में घुलती अनैतिकता और बेशर्म आचरण ने पुरुषों के मानस में स्त्री को मात्र भोग्या ही निरूपित किया है। यह आज की बात नहीं है अपितु बरसों-बरस से चली आ रही एक लिजलिजी मानसिकता है जो दिन-प्रतिदिन फैलती जा रही है। हमारी सामाजिक मानसिकता भी स्वार्थी हो रही है। फलस्वरूप किसी भी मामले में हम स्वयं को शामिल नहीं करते और अपराधी में व्यापक सामाजिक स्तर पर डर नहीं बन पाता।

3. महिलाओं का कमजोर आत्मविश्वास :

महिलाओं का अगर आत्मविश्वास प्रबल हो तो कोई भी पुरुष उनसे टक्कर नहीं ले सकता। महिलाओं को शारीरक रूप से उसे सबल बनना चाहिए और मन से भी खुद मजबूत समझे। विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की ट्रेनिंग उन्हें बचपन से ही मिलनी चाहिए। हमारा समाज लड़कियों की परवरिश इस तरह से करता है कि लड़की खुद को कमजोर और डरपोक बनाती चली जाती है पर हमें अपनी बेटियों को निडर बनाना चाहिए। हर महिला को अपने साथ अपनी सुरक्षा का साधन हमेशा साथ रखने के लिए हमें उन्हें जागरूक करना चाहिए। महिला अगर डरी-सहमी, खुद को लाचार समझती हैं तो उसे परेशान करने वालों का विश्वास कई गुना बढ़ जाता हैं। महिला की बॉडी लैंग्वेज हमेशा आत्मविश्वास से भरपूर होना चाहिए। अगर भीतर से असुरक्षित महसूस करें तब भी अपनी बेचैनी से उसे जाहिर ना होने दें।

4. एकांत में मवालियों का अड्डा :

गांव और शहर के सुनसान खंडहरों की बरसों तक जब कोई सुध नहीं लेता है तब यह जगह आवारा और आपराधिक किस्म के लोगों की समय गुजारने की स्थली बन जाती है। फार्म हाऊस में जहां बिगड़ैल अमीरजादे इस तरह के काम को अंजाम देते हैं, वहीं खंडहरों में झुग्गी बस्ती के गुंडा तत्व अपना डेरा जमाते हैं। बड़े-बड़े नेता, अफसर, उद्योगपति लोग अपना फार्म हाउस बना लेते हैं और वहां हकीकत में होता क्या ये कोई सुध नहीं लेता है। यह जगह पुलिस और प्रशासन से दूर जहां इन लोगों के लिए 'सुरक्षित' होती है, वहीं एक अकेली स्त्री के लिए बेहद असुरक्षित। महिला के चीखने-पुकारने पर भी कोई मदद के लिए नहीं पहुंच सकता। बलात्कार के 60 प्रतिशत केस में ऐसे ही मामले सामने आए हैं।

5. लचर कानून :

हमारे देश का कानून लचर है ये सब मानते हैं। अगर कानून सख्त हो तो शायद अपराधिक मामलों की संख्या बहुत कम हो जाती। कमजोर कानून और इंसाफ मिलने में देर यह भी बलात्कार की घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं। देखा जाए तो प्रशासन और पुलिस कभी कमजोर नही है पर कमजोर है उनकी सोच और उनकी समस्या से लड़ने की उनकी इच्छा शक्ति। पैसे वाले जब आरोपों के घेरे में आते हैं तो प्रशासनिक शिथिलताएं उन्हें कटघरे के बजाय बचाव के गलियारे में ले जाती हैं। पुलिस की लाठी बेबस पर जुल्म ढाती है तो सक्षम के सामने वही लाठी सहारा बन जाती है। अब तक कई मामलों में कमजोर कानून से गलियां ढूंढ़कर अपराधी के बच निकलने के कई किस्से सामने आ चुके हैं। कई बार सबूत के आभाव में न्याय नहीं मिलता और अपराधी छूट जाता है।

अंततः आज हमें बलात्कार को धर्म, मजहब के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। बलात्कारी कहीं भी हो सकते हैं, किसी भी चेहरे के पीछे, किसी भी बाने में, किसी भी तेवर में, किसी भी सीरत में। बलात्कार एक प्रवृत्ति है। उसे चिन्हित करने, रोकने और उससे निपटने की दिशा में यदि हम सब एकमत होकर काम करें तो संभवतः इस प्रवृत्ति का नाश कर सकते हैं।

देशभर में चार करोड़ से ज्‍यादा भक्‍तों और दस हजार करोड़ रु. से अधिक की संपत्ति का मालिक आसाराम बापू अब सलाखों के पीछे है। एक नाबालिग लड़की से बलात्‍कार के आरोप में जोधपुर कोर्ट ने 25 अप्रैल को आसाराम को आजीवन सश्रम कारावास की सजा सुनाई। इस फैसले से बहुत से लोग खुश हैं, लेकिन बाबा के भक्‍तों में दुख और असंतोष भी है. इस घटना के साथ ही एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि धर्म और नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले धर्मगुरु आखिर कैसे यौन अपराधी बन जाते हैं? इसके पीछे कौन से मनोवैज्ञानिक और सामाजिक, सांस्‍कृतिक कारण हैं? पूरी दुनिया में और सभी धर्मों में ऐसे लोगों की लंबी फेहरिस्‍त है, जो धर्म की आड़ में यौन शोषण करते हैं. वहीं इसके साथ एक बड़ा सवाल यह भी है कि ऐसे आपराधिक मामलों में जब भी समाज और न्‍यायपालिका का हस्‍तक्षेप होता है और अपराधी को सजा मिलती है तो भी भक्‍तों के एक बड़े तबके का भरोसा कम नहीं होता. वो खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं, बाबा के द्वारा नहीं, बल्कि न्‍यायपालिका के द्वारा। आसाराम के मामले ने भी हमारे सामने कुछ ऐसी ही नज़ीर पेश की है। इसे समझने के लिए दोनों पहलुओं पर अलग-अलग गौर करना होगा। 
धर्मगुरु क्‍यों बन जाते हैं यौन अपराधी?
धर्मगुरु एक सामान्‍य इंसान नहीं है. सामाजिक रूप से वह काफी ताकतवर है. लाखों-करोड़ों की संख्‍या में लोग उसके भक्‍त हैं, उसकी कही हर बात उनके लिए ईश्‍वर का शब्‍द है, जिसे वे आंखें मूंदकर बिना किसी तर्क और सवाल के स्‍वीकार करते हैं. उनके लिए वह पुरुष नहीं, बल्कि ईश्‍वरीय पुरुष है.ऐसी असीमित शक्तियों से लैस कोई भी आदमी जब किसी महिला या बच्‍ची के साथ यौन गतिविधियों में लिप्‍त होता है तो वह दो बराबर के मनुष्‍यों के बीच बना संबंध नहीं होता. वह सत्‍ता और ताकत का समीकरण होता है. लड़की हर तरह से कमजोर स्थिति में है. वहीं खुद को ईश्‍वर बताने वाला मनुष्‍य और उसको ईश्‍वर मानने वाले करोड़ों भक्‍त भी उसे हर सवाल और कानून से परे मानते हैं. ऐसे अधिकांश मामलों में यही होता है कि यौन शोषण और हिंसा का शिकार हो रहा व्‍यक्ति भी इसे शोषण के रूप में नहीं, बल्कि भगवान की कृपा के रूप में देखता है. अगर किसी को इससे तकलीफ भी हो तो वह खुद को इतना कमजोर और शक्तिहीन समझता है कि विरोध की हिम्‍मत नहीं जुटा पाता. ऐसे अपवाद ही होते हैं, जहां कोई कमजोर व्‍यक्ति ताकतवर के खिलाफ आवाज उठा पाए.
ऐसी अंधभक्ति क्‍यों?
यह कैसा अंधविश्‍वास और आंतरिक असुरक्षा है कि हम किसी को अपना ईश्‍वर मान लेने के लिए इस कदर व्याकुल हैं? इस सवाल का जवाब आसाराम और ऐसे तमाम बाबाओं के करोड़ों भक्‍तों के सामाजिक, आर्थिक परिवेश में है. आखिर कौन लोग बाबाओं की शरण में जाते हैं? अकसर आर्थिक रूप से कमजोर तबके से आने वाले, जीवन से हार चुके, निराश हो चुके लोग ही सहारे की जरूरत महसूस करते हैं. जो सब जगह से हारा हुआ है, उसे कोई एक शरण चाहिए. कोई एक ऐसा विश्‍वास, जिसके बूते वह अपनी तकलीफों से लड़ सके. ये बाबा अकसर समाज के कमजोर तबकों को ही अपना निशाना बनाते हैं. आसाराम, राम रहीम, इन सभी ने मुफ्त खाना, दवाइयां आदि बांटकर अपने आश्रम की शुरुआत की. जैसा कार्ल मार्क्‍स ने कहा था कि धर्म जनता की अफीम है. उसका नशा इतना इतना गहरा होता है कि वह हमारे विवेक और तर्कबुद्धि को भी ढंक देता है. इन धर्मगुरुओं के मामले में भी यही मनोविज्ञान काम करता है. 
मनोविज्ञान में एक टर्म है- कॉग्निटिव डिजोनेंस (cognitive dissonance). इसे इस तरह समझ सकते हैं. हर किसी को जीने के लिए कोई एक विश्‍वास चाहिए. यह मानवीय जरूरत है. इसलिए हर इंसान अपने लिए एक विचार, एक विश्‍वास, एक दर्शन गढ़ता है. कोई ईश्‍वर को मानता है, कोई किसी अन्‍य विचार को. अब अगर किसी भी कारण से वह विश्‍वास टूटे या ये पता चले कि जिस पर इतना भरोसा किया, वह एक धोखेबाज है, कि हमारा रक्षक ही भक्षक बन गया है तो हमारा अवचेतन (सबकॉन्‍शस) उसे स्‍वीकार नहीं करना चाहता. उसे स्‍वीकार कर लेने का अर्थ है विश्‍वास का टूट जाना. विश्‍वास यानी वह बुनियाद, जिस पर किसी व्‍यक्ति का पूरा अस्तित्‍व खड़ा है. मनोविज्ञान में यह एक बड़ा Existential Crisis या आस्तित्विक संकट है. जैसे हमारा शरीर हर संकट के खिलाफ अपना प्राकृतिक प्रतिरोध तंत्र विकसित करता है, मन भी ठीक उसी तरह काम करता है. वह अपने विश्‍वास को बनाए रखने के लिए तर्क गढ़ता है. अपना डिफेंस मैकेनिज्‍म बनाता है. किसी बाहरी व्‍यक्ति के लिए यह मूर्खतापूर्ण कुतर्क हो सकता है, लेकिन उसके लिए नहीं, जो यह तर्क बुन रहा है. वह इसे ही सच मान रहा है. यह उसका खुद को बचाए रखने का उपक्रम है. इसलिए जब आसाराम के खिलाफ न्‍यायपालिका फैसला सुनाती है तो उसके भक्‍तों के बड़े समूह को लगता है कि उनका विश्‍वास टूट रहा है, जिसे टूटने से बचाने के लिए वह कुतर्क की किसी भी सीमा तक जा सकते हैं. जैसे आसाराम के भक्‍त बोलेंगे कि कानून ही गलत है, जज ने पैसा खाया, हमारे भगवान को फंसाया गया है, आदि-आदि.कॉग्निटिव डिजोनेंस की थियरी यौन अपराधी पर भी लागू होती है. धर्मगुरु खुद भी यह मानता है कि वह हर तरह के सवालों और कानूनों से परे है. वह अपनी असीमित ताकत को अधिकार समझता है. उसका सबकॉन्‍शस भी अपने पक्ष में तर्क बुन रहा है और उसे सच मान रहा है. वह अपनी हरकतों को अपराध नहीं, बल्कि अपना विशेषाधिकार समझता है. वह मानता है कि अपनी सेवा में आई स्त्रियों के साथ यौन संबंध बनाकर वह उन पर उपकार कर रहा है. चाहे वह नाबालिग ही क्‍यों न हो.
हर धर्म में सेक्‍स है अपराध
दुनिया का हर धर्म सेक्‍स को एक तरह से अपराध मानता है. सेक्‍स प्‍लेजर या आनंद की चीज नहीं है. इसका मकसद सिर्फ संतति पैदा करना है. इसे लेकर हजारों नियम है. धर्मगुरुओं को विवाह की इजाजत नहीं है. उनसे ब्रम्‍हचर्य पालन की उम्‍मीद की जाती है. सोचकर देखें तो यह कितनी अमानवीय, कितनी क्रूर बात है. सेक्‍स हमारे लिए वैसे ही है, जैसे खाना खाना या सांस लेना.आप किसी मनुष्‍य को इतनी बुनियादी और प्रकृतिक चीज से कैसे वंचित रख सकते हैं. और जब ऐसे बेहूदे नियम बनाए जाते हैं, उसका पाठ पढ़ाया जाता है तो वह चीज छिपकर होती है. हम इंसान को इस चीज से दूर नहीं रख सकते. चाहे जितने भी प्रतिबंध लगा लें, देह की इच्‍छाएं अपने लिए दरवाजे खोल ही लेंगी. और जब ये दरवाजे नियम तोड़कर, चुपके से, झूठ बोलकर खोले जाते हैं तो आपराधिक शक्‍ल भी अख्तियार कर लेते हैं.
यह सेक्‍स नहीं, ताकत का समीकरण है
इतिहास ऐसे असंख्‍य उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहां ताकतवर व्‍यक्तियों, कौमों, जातियों और मुल्‍कों के लिए अपने से कमजोर पर आधिपत्य करने का एक तरीका उनकी स्त्रियों पर अपना अधिकार जमाना रहा है. युद्ध होते हैं तो जीते हुए मुल्‍क की स्त्रियों और बच्चियों के साथ बलात्‍कार होता है. नाजी यहूदियों को तो मारते हैं, लेकिन उनकी औरतों को अपने सुख के लिए रखते हैं. एक ऊंची जाति का व्‍यक्ति छुआछूत मानता है, लेकिन दलित स्‍त्री के साथ सोने में उसे कोई गुरेज नहीं. यहां दो ताकत के समीकरण काम कर रहे हैं. एक तो वह पुरुष है, दूसरे वह ताकतवर जाति, कौम और मुल्‍क से है.
उसकी ताकत की स्थिति उसके हर काम को जस्‍टिफाई करती है. यही काम राजा करता है, कास्टिंग काउच करने वाला मर्द करता है और धर्मगुरु भी करता है. वह ताकतवर है. यह करना उसका अधिकार है.