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बिना विचारे मतदान को मजबूर मतदाता,चुनाव आयोग बदल सकता है स्थिति

Written by अनिल यादव,सम्पादक,बैस्ट रिपोर्टर न्यूज,जयपुर on . Posted in विशेष संपादकीय आलेख

राजस्थान विधानसभा चुनाव—2018 से संबंधित निम्न तिथियों पर जरा ध्यान दीजिए——

———6 अक्टूबर 2018 को चुनाव की घोषणा।
———12 नवम्बर को चुनाव अधिसूचना।
———19 नवम्बर को नामांकन की अंतिम तिथि,
———22 नवंबर का नाम वापसी की अंतिम तिथि,
———7 दिसम्बर को मतदान और
———11 दिसम्बर को मतगणना व परिणाम घोषणा।

चुनाव कोई सा भी हो चुनाव प्रक्रिया का सम्पूर्ण समय व तिथियों का अंतर कमोबेश इतना ही रहता है। नामांकन वापसी के अंतिम तिथि के अगले दिन जनता के सामने यह स्पष्ट हो पाता है कि आखिर उनके प्रत्याशी होंगें कौन? बड़े बड़े दावों के साथ सेवाभाव का दावा करने वाले अचानक अवतरित हुए इन प्रत्याशियों में अधिकांश प्रत्याशी वे होते हैं जिनको जानना तो बहुत दूर की बात है,क्षेत्र की जनता ने कभी उनका नाम भी नहीं सुना होता है। बड़े दल भी अपने फाइनल प्रत्याशी अंत तक ही घोषित करते हैं। इसके बाद अगले 15 दिन तक शोर चलता है क्षेत्र में ताबड़तोड़ प्रचार व अनाप—शनाप वादों का। आम तौर पर एक विधानसभा क्षेत्र में करीब 175 से 200 बूथ होते हैं,यानी प्रत्याशी का लक्ष्य हुआ 15 दिन 200 बूथ पर प्रचार अर्थात प्रतिदिन करीब 12—13 बूथों पर जनसंवाद करना। प्रत्याशी अपनी क्षमता के अनुसार सभी बूथों को टच करने की कोशिश करता है और कर भी लेता है परन्तु इस ताबड़तोड़ प्रचार के दौरान जनता को प्रत्याशी सिर्फ दूर से हाथ हिलाता व भीड़ से घिरा हुआ भाषण देता ही दिखाई देता है,प्रत्याशी संवाद करता है परन्तु उसका संवाद सिर्फ एक तरफा होता है,सब उसकी सुनते हैं परन्तु अत्यधिक व्यस्तता के चलते उसके लिए जनता के मन की बात सुनना व समझना लगभग असम्भव होता है,वो सिर्फ चाहे—अनचाहे हाथ जोड़कर,मुह पर सच्ची—झूठी मुस्कान चिपकाकर,जनता के सवालों का कड़वा घूंट पीकर मतदान तिथि का इंतजार करता है और मतदान समय समाप्त होते ही थकान व घुटन भरे माहौल से राहत महसूस करता है परन्तु अभी भी वो जनता को पूरी तरह से नजरंदाज नहीं करता ये सोचकर की पता नहीं परिणाम पक्ष में नहीं आया तो ? मतदान के परिणाम के बाद जीते हुए लोग जीत में मदमस्त होकर,हारे हुए लोग हार के गम में अगले पांच साल के लिए अपने अपने बंगलों में कैद हो जाते हैं और 15 दिन के अभूतपूर्व सम्म्मान व मान मनौवल के बाद जनता एक बार फिर अनाथ हो जाती है,कुछ दिन सोचती है रहती है कि शायद कोई उन्हें पूछेगा,थोड़े दिन बाद खुद ही समझ जाती । चुनाव परिणाम से पूर्व तक पलक पांवड़े बिछाकर आमंत्रण देने वाले इन बंगलों में अब सिर्फ चुनिंदा लोगों का ही प्रवेश हो पाता है और दलाली करने वाले व चापलूस किस्म के लोग इन बंगलों की खास पसंद हो जाते हैं। जनता, समाचार—पत्रों,टी.वी.मोबाईल तथा बड़ी—बड़ी सभाओं में सिर्फ इन ठगों के मन की बात सुनने के लिए मजबूर हो जाती है,जन की बात सुनने के लिए कोई भी जनप्रतिनिधि अपनी ओर से कोई प्रयास नहीं करता है। यदि कोई जोश में आकर ,हिम्मत करके नेता जी के बंगले पहुंच जाए तो उसे पहले तो मिलेगी उपेक्षा, फिर मिलेगा झूठा आश्वासन, अकेल दुकेले पीड़ित ने अगर नेताजी से अपनी समस्या पर थोड़ी जिद कर ली तो मिलेगा बाहर जाने का रास्ता,दो धक्के तथा अगली बार स्वयं को वोट ना देने का सुझाव। अपमानित व ठगी का शिकार हुई जनता फिर से पांच साल इंतजार करती है और पांच साल बाद फिर किसी नए ठग के द्वारा मात्र 15 दिन के ढोंग—पाखण्ड के बाद ठग ली जाती है। ये सिलसिला चलता रहा है,चल रहा है और शायद चलता रहेगा।

क्या ठगी की गुंजाइश रखने वाली तथा ठगों की प्रिय ऐसी चुनाव प्रणाली में कोई सुधार नहीं होना चाहिए ? क्या लोकतंत्र के नाम पर हो रही जनप्रतिनिधियों की इस ठगी को रोका जाना संभव नहीं है? हमारी राय में इस ठगी को रोका जाना बेहद जरूरी है और हमारी निर्वाचन प्रणाली में कतिपय संशोधन करके इस ठगी को यकीनन रोका जा सकता है। दरसल हमें पहले समझना होगा कि वर्तमान प्रणाली आखिर हमे ठगी का शिकार कैसे बना रही है?


देखिए। चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद से ही निर्वाचन आयोग सहित देशभर के लगभग हर तबके के प्रबुद्ध लोग जनता को मतदान का महत्व समझाने लग जाते हैं तथा जनता से अपील करने लगते हैं कि लोकतंत्र में मतदान करना व सोच समझकर मतदान करना बेहद जरूरी है। कभी—कभी मतदान को अनिवार्य करने की मांग भी उठाई जाती रहती है। मतदान करने वाले को हीरो व ना करने वाले को जीरो बताने का प्रयास किया जाता है।

निर्वाचन आयोग व प्रबुद्ध लोगों के उक्त प्रयास निरर्थक नहीं हैं परन्तु वो अधूरे अवश्य हैं । अधूरे इसलिए क्योंकि वे हमें ये तो बताते हैं कि सोच—समझकर मतदान करना बेहद जरूरी है परन्तु ये नहीं बताते कि सोच समझकर मतदान करें कैसें ? क्योंकि चुनाव से पूर्व होने वाले 15 दिन के चुनावी शोर में जनता को सोचने समझने का पर्याप्त मौका मिल ही नहीं पाता है और चुनाव पूर्ण होने के बाद जनता के सोचने व समझने का कोई फायदा नहीं होता है।
चुनाव के बाद कुछ अच्छा होगा बस इसी उम्मीद में जनता की आंखें पथरा जाती हैं। दरसल हमारी वर्तमान निर्वाचन प्रणाली में बहुत सी कमियां हैं परन्तु एक कमी ऐसी है जिसपर यदि जरा भी ध्यान दिया जाये तो मतदाता जल्दबाजी में बिना सोचे समझे मतदान करने की मजबूरी से मुक्त हो सकता है तथा लोकतंत्र आज की अपेक्षा अधिक सार्थक हो सकता है। हम जिस कमी की बात कर रहे हैं वो कमी है———चुनाव से पूर्व प्रत्याशी चयन हेतु जनता को पर्याप्त समय का नहीं मिल पाना ।

दोस्तों हम आपको इस आलेख के आरम्भ में ही बता चुके हैं कि कैसे मात्र 15 दिन पहले जनता को अपने प्रत्याशियों की जानकारी मिलती है,इन 15 दिन में भी किसी बूथ के मतदाताओं के हिस्से में आता है मात्र आधे से एक घण्टे का समय वो भी सिर्फ भीड़ से घिरे प्रत्याशी को दूर से देखने व सुनने का। क्या मात्र आधे—एक घंटे के एक तरफा संवादों के आधार पर किसी भी प्रत्याशी का सही मूल्यांकन संभव है,क्या इतनी सी मुलाकात के आधार पर वास्तव में किसी व्यक्ति को आप अपना भाग्य विधाता बना सकते हैं। नहीं, बिलकुल नहीं,ऐसा करना संभव ही नहीं है परन्तु वर्तमान निर्वाचन प्रणाली जनता को ऐसा करने पर मजबूर करती है। चलिए ये तो हो गई समस्या परन्तु अब आप ये सोच रहे होंगें कि समस्या तो हम सभी जानते हैं परन्तु समाधान क्या है ? समाधान हो सकता है वो भी बेहद सरल,निर्विवाद व जनहितकारी। इसके लिए चुनाव आयोग को सिर्फ तीन मामूली काम करने होंगें ——

1. चुनाव आयोग के पोर्टल पर चुनाव लड़ने के इच्छुक सभी लोगों का निर्वाचन क्षेत्रवार आॅन लाईन पंजीकरण अनिवार्य कर दिया जाए,
2. चुनाव लड़ने हेतु पंजीकृत मतदाताओं की सूची मय फोन नम्बर,मेल आई.डी.व पूरे पते के, सार्वजनिक की जाए,ताकि जनता अपने भावी प्रत्याशीयों को जान पाए,
3. चुनाव लड़ने के लिए बतौर पात्रता पंजीकृत निर्वाचन क्षेत्र में कम—से—कम तीन वर्ष की सक्रिय सेवा अनिवार्य कर दी जाए।

उक्त तीन कामों को करने से चार मुख्य सकारात्मक प्रभाव पडेंगें——

1.पंजीकृत राजनेताओं की सूची सार्वजनिक होने के कारण जनता को अपने सम्भावित प्रत्याशियों को जानने,समझने तथा परखने का भरपूर समय मिल जायेगा जिससे मतदान के समय उनके द्वारा डाला गया वोट वर्तमान की तुलना बेहद अधिक तार्किक व सार्थक होगा।
2. जनता को तीन वर्ष के लिए सैकड़ों सेवाभावी लोगों का साथ मिल जायेगा।
3. देश की सभी पाटियों के कार्यकर्ताओं को चुनावों के समय अचानक प्रकट होने वाले पैराशूट लीडरों व दलबदलूओं से मुक्ति मिल जायेगी।
4.चुनाव आयोग को पंजीकरण शुल्क के रूप में भारी भरकम आय होगी।

हमारी मान्यता है कि उक्त सुझाव को लागू करने में किसी को किसी भी प्रकार के नुकसान की कोई संभावना नहीं है। इससे जनता द्वारा किया गया मतदान आज की अपेक्षा और अधिक तार्किक बन जाएगा। उम्मीद है केन्द्रीय व राज्य निर्वाचन आयोग इस सुझाव पर विचार कर आगामी चुनावों में सकारात्मक परिवर्तन करेंगें।