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निरु छाबड़ा ने 700 चावल पर ब्रुश से लेखन कर "पर्यावरण एक समग्र दृष्टि" कृति बनाई

Written by कार्यालय,बैस्ट रिपोर्टर न्यूज,जयपुर। समाचार डेस्क प्रभारी—2-पी.सी.योगी on . Posted in सामाजिक,सांस्कृतिक,धार्मिक समाचार

बैस्ट रिपोर्टर न्यूज,जयपुर(आशा पटेल)। आज पर्यावरण दिवस के शुभ अवसर पर प्रसिद्ध कलाकार निरु छाबड़ा ने 700 से अधिक चावल पर ब्रुश से सूक्ष्म लेखन कर "पर्यावरण एक समग्र दृष्टि" कृति बनाई है। इसके माध्यम से इसमें पर्यावरण के तत्व, रक्षा, रक्षा के परिणाम, विनाश के कारण व विनाश के परिणाम को बताते हुए, वृक्षों के संरक्षण, सुरक्षा, संवर्धन व करेहि पज्जावरण रक्खणम श्लोक लिखकर इस कृति के माध्यम से पर्यावरण के महत्व को दर्शाया है।
चावल पर लिखा है----

महावीर बुद्ध जीवंत कविदृष्टा थे, जिन्होंने सृष्टि के कण कण में व्याप्त जीवन को देखा और उसकी धड़कन का संगीत सुना और उसके स्वर में स्वर मिलाकर अहिंसा धर्म की उदभावना की। उन्ही धार्मिक जनों की प्रेरणा से पूरा जन मानस उमड़ पड़ा। गंगा को मैया पुकारता हुआ, पशुओं को मां बाप, भैया सम्भोधता हुआ, पक्षियों को दाना चुगाता हुआ, कीट पतंगों की रक्षा करता हुआ और न जाने क्या क्या? यह सब किसी स्वार्थ और लिप्सा की पूर्ति के लिए नहीं, अपितु अपने अंतरंग में किसी ईश्वरीय आनंद की अनुभूती लिए हुए है। यह आनंद लिप्सा पूर्ति से नहीं, बल्कि ईश्वरीय सत्ता में अपने को सर्वागत: समर्पित करते हुए तन - मन - धन, मनसा-वासा-कर्मणा समष्टि के निमित्त त्याग करते हुए प्राप्त होता है। इस आनंदमय त्याग से ही पर्यावरण की रक्षा संभव है। धर्म और केवल धर्म ही इस पर्यावरण का रक्षक हो सकता है। धर्म भय नहीं जगाता, प्रेम जगाता है, लिप्सा नहीं, संवेदनशीलता तथा त्याग से ही सृष्टि के पर्यावरण की रक्षा हो सकेगी ।

जैन धर्म ने पर्यावरण के मूल घटक, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति के दुरुपयोग, अत्यधिक उपयोग या नष्ट करने से संबंधित सामाजिक एवं धार्मिक निषेध स्थापित किए हैं, जिससे प्रकृति के इन उपहारों का संरक्षण हो सके और पर्यावरण भी विनिष्ट ना हो। मनुष्य की सामान्य इच्छाओं की पूर्ति प्रकृति द्वारा बिना किसी कठिनाई से पूरी की जा सकती है, किंतु जब इच्छा बहुगणित होकर कलुषित हो जाती है तब उसे पूरी करना प्रकृति के लिए कठिन हो जाता है। मनुष्य की यह बहु गणित इच्छा ही प्राकृतिक संकटों की जननी है, बहुगणित इच्छा की तुष्टि के कारण ही पर्यावरण तहस-नहस हो रहा है। पर्यावरण के संरक्षण में धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं का अत्यधिक योगदान है अतः प्राचीन मान्यताओं को उर्जा देकर पुनर्जीवित करके इस क्षेत्र में पर्याप्त जागृती लाई जा सकती है।